One Night Sex
Anonymous
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मैं राहुल हूँ, 26 साल का। दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता हूँ। मेरा घर हरियाणा में है, लेकिन नौकरी की वजह से परिवार से दूर रहता हूँ। एक छोटा-सा किराए का कमरा है, सुबह ऑफिस जाना और रात को वापस आकर अकेले डिनर करना—बस यही मेरी लाइफ थी।
दोस्त थे, लेकिन कोई ऐसा नहीं था जिसके साथ मैं अपने दिल की हर बात शेयर कर सकूँ। इसलिए कभी-कभी शुक्रवार की रात मैं क्लब चला जाता था। वहाँ थोड़ी देर म्यूज़िक सुनता, दोस्तों के साथ ड्रिंक करता और फिर अपने कमरे पर लौट आता।
उस दिन ऑफिस में काम बहुत ज़्यादा था। मैं शाम को काफी थका हुआ था, लेकिन घर जाकर अकेले बैठने का मन नहीं था। मैंने अपने फ्रेंड अमन को फोन किया।
“भाई, आज कहीं चलते हैं। ऑफिस ने दिमाग खराब कर दिया है।”
अमन ने हँसकर कहा, “आज क्लब चलते हैं। फ्राइडे है, थोड़ा चिल्ल करेंगे।”
रात करीब दस बजे हम क्लब पहुँच गए। अंदर तेज़ म्यूज़िक चल रहा था। कलरफुल लाइटें थीं और लोग डांस कर रहे थे। मैंने एक टेबल पर बैठकर ड्रिंक ऑर्डर की।
तभी मेरी नज़र सामने खड़ी एक लड़की पर पड़ी।
उसने ब्लैक कलर की ड्रेस पहनी थी। वह अपनी फ्रेंड्स के साथ थी और किसी बात पर हँस रही थी
मैं उसे देख ही रहा था कि अचानक उसकी नज़र मुझसे मिली। उसने हल्की-सी स्माइल दी और फिर अपनी फ्रेंड्स के साथ बात करने लगी।
कुछ देर बाद वह खुद मेरी टेबल के पास आई।
“यहाँ अकेले बैठे हो?” उसने पूछा।
मैंने कहा, “दोस्त आया है, लेकिन अभी कहीं गायब है।”
वह हँस पड़ी।
“मतलब तुम भी मेरी तरह कोई कंपनी ढूँढ़ रहे हो?”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “शायद।”
उसका नाम सिया था। वह भी जॉब करती थी और उस रात अपनी फ्रेंड्स के साथ बाहर आई थी।
हमारी बातें शुरू हुईं। पहले ऑफिस की, फिर सिटी की लाइफ की और फिर उन चीज़ों की, जिन्हें हम आम तौर पर किसी अनजान इंसान को नहीं बताते।
रात बढ़ती गई। हमने ड्रिंक्स भी लीं। हमें अंदाज़ा नहीं हुआ कि हम दोनों ज़रूरत से ज़्यादा पी चुके थे।
कुछ देर बाद सिया ने कहा, “यहाँ बहुत शोर है। कहीं शांति से बैठकर बात करें?”
मैंने क्लब के अंदर बने एक प्राइवेट लाउंज की तरफ इशारा किया। वहाँ अलग रूम्स थे, जहाँ लोग बैठकर आराम से बात कर सकते थे।
हम दोनों वहाँ चले गए।
कमरे में म्यूजिक की आवाज बहुत धीमी थी। बाहर की रोशनी दरवाजे के नीचे से अंदर आ रही थी।
सिया सोफे पर बैठ गई और अपने बाल पीछे करते हुए बोली, “आज बहुत दिनों बाद इतना अच्छा लग रहा है।”
मैं उसके पास बैठ गया।
“मुझे भी। वरना ऑफिस और कमरे के बीच ही जिंदगी निकल रही है।”
वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई।
मैंने उसका हाथ पकड़ा और धीरे से अपनी तरफ खींचकर उसे अपनी बाहों में समेट लिया। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी नरम बाहें मेरे गले में डाल दीं और अपना पूरा वजूद मुझमें छोड़ दिया।
मैंने झुककर प्यार से उसके माथे पर होंठ रखे। वह एक गहरी साँस के साथ मदहोश होकर मुस्कुराई, और मेरे गालों को अपने हाथों से सहलाते हुए और करीब आ गई। जैसे ही हमारे होंठ एक-दूसरे से मिले, समय जैसे थम सा गया। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और मुझे और कसकर अपनी बाँहों में भींच लिया।
हम दोनों एक-दूसरे की साँसों में घुल रहे थे। मैंने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामा, उसकी आँखों में देखा और बहुत धीमी और बहकी हुई आवाज़ में पूछा, “तुम ठीक हो ना?”
उसने मेरी आँखों में झाँककर, अपने भीगे होठों पर हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “हाँ, राहुल… तुम्हारे साथ हूँ, तो सब कुछ बिल्कुल सही है।”
इसके बाद हमारे बीच की सारी दूरियाँ पूरी तरह पिघल गईं। माहौल में एक अलग ही नशा और गर्माहट थी। मैंने अपनी शर्ट उतारकर एक तरफ फेंक दी। सिया अब मेरे और करीब आ गई थी। जब मैंने उसके बदन को छुआ, तो वह सिहर उठी और उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। उसके बदन की महक और उसकी गर्म साँसें मेरे सीने पर महसूस हो रही थीं।
हम दोनों की धड़कनें एक ही ताल पर चल रही थीं। हमने एक-दूसरे की रज़ामंदी और चाहत के साथ हर हद को पार किया। वह हर पल को पूरी शिद्दत से महसूस कर रही थी और मैं भी उसे अपनी बाहों में जकड़कर उसके हर अहसास को अपने अंदर उतार लेना चाहता था। वह रात प्यार, चाहत और दीवानगी से भरी हुई थी, जहाँ हम दोनों एक-दूसरे में खोए रहे।
सुबह होने से पहले, जब सब शांत हुआ, तो हम पसीने से तरबतर उस बेड पर एक-दूसरे से लिपटे हुए लेट गए। उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया, उंगलियों में उंगलियाँ डालीं, और सुकून से अपनी आँखें बंद कर लीं।
मुझे लगा था कि यह सिर्फ एक रात का नशा था, जो सुबह होते ही उतर जाएगा। मुझे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि जिस लड़की को मैंने अपनी बाहों में इतनी शिद्दत से चाहा है, वह कुछ ही दिनों बाद मेरे ऑफिस में कदम रखेगी और खुद को मेरे सख्त बॉस की इकलौती बेटी के रूप में इंट्रोड्यूस करेगी।
सुबह करीब छह बजे मेरी आँख खुली। कमरे में हल्की रोशनी आ रही थी। मेरा सिर भारी था और मुझे रात की सारी बातें ठीक से याद नहीं आ रही थीं। मैंने बगल में देखा, सिया उठ चुकी थी और अपना बैग ठीक कर रही थी।
मैंने पूछा, “इतनी सुबह कहाँ जा रही हो?”
उसने मेरी तरफ देखा और कहा, “मुझे घर जाना है। कल रात अच्छी थी, लेकिन मैं नहीं चाहती कि हम इसे ज़रूरत से ज्यादा गंभीर बनाएँ।”
मैं कुछ पल चुप रहा, फिर कहा, “ठीक है। तुम्हारी मर्जी।”
उसने अपना फोन उठाया, दरवाजे की तरफ गई और जाते-जाते बोली, “अपना ख्याल रखना, राहुल।”
“तुम भी।”—मैंने जवाब दिया।
दरवाजा बंद हो गया। मुझे उसका पूरा नाम तक नहीं पता था। न ऑफिस, न घर। मेरे पास बस उसका पहला नाम और उस रात की कुछ यादें थीं।
अगले तीन-चार दिन सामान्य तरीके से निकल गए। मैं सुबह ऑफिस जाता, काम करता और शाम को लौट आता। मुझे लगा था कि वह बस एक रात की मुलाकात थी।
फिर बुधवार को हमारे मैनेजर ने सभी को मीटिंग के लिए बुलाया।
“कल कंपनी में एक बड़ी मीटिंग और उसके बाद पार्टी है। हमारे नए प्रोजेक्ट की चर्चा होगी। कंपनी के डायरेक्टर भी आएँगे, इसलिए सभी समय पर पहुँचना।”
अगले दिन मैं मीटिंग रूम में पहुँचा। कुछ देर बाद हमारे बॉस, मिस्टर मेहरा, अंदर आए। उनके साथ एक लड़की भी थी।
मैंने पहली नजर में उसे देखा और मेरा दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया। इस बार सफेद शर्ट और काली पैंट में एक प्रोफेशनल अंदाज में खड़ी हुई लड़की कोई और नहीं, बल्कि सिया थी।
सिया ने भी कमरे में नजर घुमाई। जब उसकी नजर मुझ पर पड़ी, तो उसके चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई—वह मुझे पहचान चुकी थी।
मिस्टर मेहरा ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचते हुए कहा, “आप सभी से मिलवाना चाहता हूँ। ये मेरी बेटी सिया हैं। इन्होंने हाल ही में विदेश से अपना मैनेजमेंट कोर्स पूरा किया है और अब हमारी कंपनी के नए प्रोजेक्ट पर काम करेंगी।”
मेरे हाथ ठंडे पड़ने लगे। जिस लड़की को मैं एक रात पहले तक सिर्फ एक अनजान लड़की समझ रहा था, वह मेरे बॉस की बेटी थी।
तभी बॉस ने कहा, “राहुल, आप इस प्रोजेक्ट की रिपोर्ट तैयार कर रहे थे ना? जरा सिया को इसकी जानकारी दे दीजिएगा।”
मैंने धीरे से कहा, “जी, सर।”
सिया ने मेरी तरफ देखा और बहुत सामान्य आवाज में कहा, “हैलो, राहुल। हम पहले भी मिल चुके हैं, है ना?”
मैंने खुद को संभालते हुए कहा, “जी, एक बार मिले थे।”
वह हल्का-सा मुस्कुराई। “अच्छा। फिर तो काम करना आसान रहेगा।”
लेकिन मुझे पता था कि अब कुछ भी आसान नहीं रहने वाला था।
शाम को कंपनी की पार्टी शुरू हुई। ऑफिस की छत पर खूबसूरत सजावट की गई थी। लोग बातें कर रहे थे, ड्रिंक्स ले रहे थे और नए प्रोजेक्ट की खुशी मना रहे थे।
मैं एक कोने में खड़ा ड्रिंक का ग्लास थामे शहर के जगमगाते नज़ारे को देख रहा था, तभी सिया की आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा।
उसने धीमी आवाज़ में पूछा, “तुम मुझसे बच क्यों रहे हो, राहुल?”
मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “बच नहीं रहा, बस हालात थोड़े अजीब हैं। तुम्हारे डैड मेरे बॉस हैं, और…”
वह बीच में ही बात काटकर बोली, “मैं जानती हूँ। और मैं यह भी जानती हूँ कि उस रात जो हुआ, वह हमारी अपनी मर्ज़ी से था। मैं इस रिश्ते या हमारी मुलाकात को लेकर ऑफिस में कोई ड्रामा नहीं चाहती, राहुल।”
मैंने राहत की साँस ली। “मैं भी यही चाहता हूँ। हम दोनों यहाँ पेशेवर (professional) तरीके से काम करने आए हैं।”
उसने सिर हिलाया। फिर कुछ पल चुप रहने के बाद, उसने एक गहरा सवाल पूछा—
“लेकिन एक बात बताओ... अगर तुम्हें उस रात पता होता कि मैं कौन हूँ, तो क्या तुम्हारा रवैया मेरे प्रति अलग होता?”
मैंने कुछ पल सोचकर ईमानदारी से कहा, “शायद नहीं। उस रात मैंने तुम्हारे पद या परिवार को देखकर तुमसे बात नहीं की थी, बल्कि उस इंसान को देखा था जो मेरे सामने बैठा था।”
मेरी बात सुनकर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और सम्मान का भाव तैर गया।
“सही कह रहे हो,” उसने धीरे से कहा। “हम दोनों ने एक-दूसरे को बिना किसी पहचान के जाना था, और शायद यही इस बात की सबसे खूबसूरत चीज़ थी।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “अब हमारे पास एक-दूसरे को सही तरीके से जानने का पूरा मौका है। और इस बार बिना किसी जल्दबाजी के।”
सिया ने मेरी आँखों में देखा और पहली बार ऑफिस के उस माहौल में खुलकर मुस्कुराई।
“ठीक है, राहुल। तो इस बार शुरुआत ज़ीरो से करते हैं... एक सिंपल सी कॉफ़ी के साथ।”
मैं भी हँस पड़ा। “मंजूर है। और इस बार बिना किसी नशे या भ्रम के।”
पार्टी खत्म होने तक हमारे बीच यह साफ हो चुका था कि हम अतीत के साये को वर्तमान पर हावी नहीं होने देंगे। हमने एक-दूसरे की सीमाओं और गरिमा का पूरा सम्मान किया था।
वे कुछ महीने हमारे लिए बहुत खास रहे। हमने साथ मिलकर ऑफिस का वह बड़ा प्रोजेक्ट पूरी मेहनत और ईमानदारी से पूरा किया। इस दौरान हमारे बीच एक गहरी समझ और दोस्ती बन चुकी थी, जहाँ एक-दूसरे के लिए इज्जत के अलावा कुछ नहीं था।
लेकिन जैसे ही वह प्रोजेक्ट पूरी तरह कम्प्लीट हुआ, सिया को कंपनी के काम से वापस विदेश जाना पड़ा। उसके जाने के बाद ऑफिस का माहौल फिर से पहले जैसा हो गया। वह अपनी दुनिया में व्यस्त हो गई और मैं अपनी आम जिंदगी में लौट आया।
आज भी जब कभी मैं उन पुरानी रातों या उस प्रोजेक्ट के दिनों को याद करता हूँ, तो चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती है। अब न तो वह मेरे साथ है और न ही मैं उसकी जिंदगी में... बस आज हमारे पास एक-दूसरे की खूबसूरत यादें हैं, जो हमेशा के लिए दिल के किसी कोने में सुरक्षित रह गईं।
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