जुनून या धोखा
Anonymous
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रात के ठीक 11 बजे, क्लिनिक का वो खामोश ऑपरेशन थिएटर सिर्फ एक हल्की नीली रोशनी से जगमगा रहा था। मैं टेबल पर लेटी थी और मेरी दिमाग पर दो पतले इलेक्ट्रोड लगे थे। मॉनिटर पर चलती हरी लकीरें मेरी दिमागी गतिविधियों को ट्रैक कर रही थीं—खासकर उन यादों को, जिन्हें मिटाने के लिए मैंने खुद दस्तखत किए थे।
"क्या तुम पूरी तरह तैयार हो, आराध्या?" डॉक्टर की गंभीर आवाज गूंजी। "इस 'मेमोरी वाइप न्यूरल थेरेपी' के बाद, रेहान का नाम, उसका अहसास, उसकी बेवफाई... सब कुछ हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।"
मैंने आंखें बंद किए बस हां में सिर हिला दिया। मेरी आंख के कोने से एक गरम आंसू बह निकला। रेहान... मेरा पहला प्यार, और वही इंसान जिसने हमारी शादी से ठीक दो हफ्ते पहले मुझे दर्द के गहरे अंधेरे में अकेला छोड़ दिया था। उसकी बेवफाई का दर्द इतना गहरा था कि मैं हर सांस के साथ टूट रही थी। तभी मशीन से एक हल्की बीप की आवाज आई। मेरे दिमाग में एक तेज झटका सा लगा, और उसके बाद सिर्फ एक खामोश सन्नाटा छा गया।
छह महीने बाद।
अब मैं एक बड़ी कंपनी में हेड ऑफ डिजाइन बन चुकी थी। मेरी जिंदगी में एक ठहराव सा आ गया था, लेकिन सीने में बाईं तरफ हमेशा एक अजीब सा खालीपन महसूस होता था—जैसे मेरी जिंदगी की किताब से कोई बहुत जरूरी पन्ना ही फाड़ दिया गया हो।
तभी, कंपनी की एनिवर्सरी पार्टी में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के नए पार्टनर के आने का ऐलान हुआ।
हॉल में हल्का संगीत बज रहा था और ह्विस्की की धीमी महक फैली थी। मैं हाथ में ड्रिंक लिए खिड़की के पास खड़ी थी, तभी अचानक पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। नए पार्टनर 'विक्रम मेहरा' ने एंट्री ली। वो बेहद आकर्षक थे—तेज नैन-नक्श, बिखरे हुए घने बाल और सम्मोहन से भरी गहरी आंखें।
जैसे ही मेरी नजर उन पर पड़ी, मेरे हाथ से ग्लास छूटते-छूटते बचा। मेरा दिल बिना किसी वजह के तेजी से धड़कने लगा। मेरी रूह में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई, मानो मेरा पूरा वजूद उस अनजाने चेहरे को पहचान रहा हो, भले ही मेरा दिमाग पूरी तरह कोरा था।
विक्रम सीधे मेरी तरफ चलकर आए। उनकी चाल में एक अजीब सा आत्मविश्वास था, और होठों पर एक ऐसी मुस्कान जो जितनी कातिलाना थी, उतनी ही दिलकश भी।
"हेलो, आराध्या," विक्रम ने अपनी गहरी, भारी आवाज में हाथ बढ़ाते हुए कहा।
जैसे ही मेरी उंगलियों ने विक्रम की गरम हथेली को छुआ, मेरे रोंगटे खड़े हो गए। एक अजीब सा, खिंचाव मुझे उनकी तरफ खींचने लगा।
"क्या... क्या हम पहले कभी मिले हैं?" बिना सोचे-समझे मेरे मुंह से निकल गया।
विक्रम की आंखों में एक पल के लिए तूफान सा उठा। उन्होंने मेरे कान के पास झुककर फुसफुसाते हुए कहा, "बिल्कुल नहीं। अगर मैं तुमसे पहले मिला होता, तो तुम्हें कभी खुद से दूर नहीं जाने देता।"
अगले कुछ हफ्तों में, विक्रम मेरे ख्यालों पर पूरी तरह हावी हो गए। वो मेरे लिए रेहान नहीं थे—कम से कम मैं तो यही सोचती थी। विक्रम बेहद आत्मविश्वासी, थोड़े जुनूनी और बहुत ही पैशनेट थे।
फिर एक रात, खाली ऑफिस के पेंटहाउस केबिन में एयर कंडीशनर की ठंडक के बीच, हमारे बीच की सारी दूरियां हमेशा के लिए मिट गईं।
विक्रम ने मुझे कमर से पकड़ा और एक झटके में कांच की बड़ी सी ऑफिस टेबल पर बैठा दिया। मेज पर रखी फाइलें, पेन स्टैंड और लैपटॉप नीचे फर्श पर जा गिरे, लेकिन उस सन्नाटे में हम दोनों को उस शोर की कोई परवाह नहीं थी। कमरे में सिर्फ एसी की सरसराहट और हमारी तेज होती सांसों की आवाजें गूंज रही थीं।
विक्रम की उंगलियां मेरी सिल्क की ब्लाउज के बटनों को खोलने लगीं। एक-एक करके बटन खुलते गए और ठंडी हवा के झोंकों ने मेरी सांसें और तेज कर दीं। मैंने कसकर आंखें बंद कर लीं, लेकिन उनके अहसास में ऐसा जादू था कि मेरा जिस्म खुद-ब-खुद उनकी तरफ खिंचता चला गया। कंधे से कपड़ा हटाकर उन्होंने अपनी उंगलियों की गर्माहट मेरी नंगी पीठ पर उड़ेल दी। उनके अहसास में एक अजीब सा जुनून था—एक ऐसा हक जताने वाला गुस्सा, जिसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया।
जब टेबल का ठंडा कांच मेरी नंगी पीठ से लगा, तो मेरे होठों से एक हल्की सी सिहरन भरी सांस निकली। विक्रम ने मुझे खुद को संभालने का जरा भी मौका नहीं दिया। उन्होंने मेरी दोनों कलाइयों को मेरे सिर के ऊपर कांच पर रोक दिया और सीधे मेरी आंखों में झांका। उनकी नजरों में सिर्फ चाहत नहीं थी, एक हदों से परे जुनून था।
"क्या तुम मुझसे दूर भागने की कोशिश कर रही थीं, आराध्या?" विक्रम की आवाज मेरी गर्दन के पास एक धीमी फुसफुसाहट बनकर गूंजी। "क्योंकि तुम्हारा जिस्म मुझसे इनकार नहीं कर सकता।"
उन्होंने मेरी कमर को अपनी उंगलियों से सहलाया। वो अहसास इतना तेज और नशीला था कि मैं पूरी तरह कांप उठी। मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही विक्रम के होंठ मेरी गर्दन से होते हुए कंधों तक पहुंचे, मेरी सारी जिद एक बेबस आह में बदल गई।
हमारी पहली नजदीकियां वहीं उस टेबल पर हुईं—एक बेहद जुनूनी और बेबाक अहसास, जहां हमारी सांसें और दिल की धड़कनें एक-दूसरे में उलझ गईं। विक्रम का हर स्पर्श मुझे एक ऐसी गहराई में ले जा रहा था, जहां सोचने-समझने की ताकत ही खत्म हो जाती है। मैंने आंखें बंद कर लीं और कसकर उनकी पीठ को पकड़ लिया।
लेकिन, यह तो सिर्फ शुरुआत थी।
जैसे-जैसे रात ढलती गई, केबिन के अंदर का जुनून और बढ़ता गया। विक्रम ने मुझे टेबल से उठाया और सीधे कोने में रखे बड़े से लेदर सोफे पर ले गए। उन्होंने मुझे सोफे पर लिटाया और मुझे संभलने का एक पल भी नहीं दिया। उस नीली डिम लाइट में उनका चेहरा और भी रहस्यमयी लग रहा था।
वो अपनी मर्जी से मेरे वजूद के हर हिस्से को छूते और महसूस करते रहे। उनके अहसास में एक अजीब सी जिद थी, जैसे वो मेरे जिस्म पर अपना नाम लिखना चाहते हों। मेरी सांसें उखड़ने लगी थीं और मेरा शरीर खुद-ब-खुद उनके हर इशारे पर ढलता जा रहा था। जब हमारे बीच का आखिरी फासला भी मिट गया, तो पूरा कमरा सिर्फ हमारी तेज सांसों और उस खो जाने वाले अहसास से भर गया।
यह अहसास पहले से भी ज्यादा गहरा, धीमा और रूह को हिला देने वाला था। मुझे लगा जैसे मैं किसी गहरे नशे में डूबती जा रही हूं, जहां दर्द और खुशी के बीच का फर्क ही खत्म हो चुका था।
फिर, जब रात का आखिरी पहर आया और खिड़की के बाहर शहर की लाइटें धीमी पड़ने लगीं, तब एक नया तूफान आया।
जब मेरी पीठ कांच की ठंडी दीवार से टकराई, तो मेरी रीढ़ में एक तेज सिहरन दौड़ गई। बाहर दिखते शहर के नजारों के बीच, विक्रम ने पीछे से मुझे पूरी तरह अपने आगोश में ले लिया। उनका एक भारी हाथ मेरी कमर पर कसा हुआ था, जबकि दूसरे हाथ से उन्होंने मेरा चेहरा पीछे की तरफ मोड़ रखा था।
"मुझे देखो, आराध्या..." विक्रम की गरम और उखड़ी हुई सांसें मेरे कान के पास टकराईं। "कांच में अपनी आंखों को देखो... और मुझे बताओ कि तुम किसकी हो।"
मेरी उंगलियां कांच पर फिसलती रहीं, पीछे भाप और उंगलियों के निशान छोड़ती गईं। उनका वो जुनूनी अहसास और बेइंतहा चाहत मेरे वजूद को जड़ से हिला रही थी। मेरा शरीर पूरी तरह विक्रम के बहाव में बह चुका था—ना कोई सोच, ना कोई झझक, बस एक बेबस समर्पण।
इस तीसरी बार में विक्रम की दीवानगी हर हद पार कर चुकी थी। उन्होंने मुझे संभलने के लिए एक सेकंड का वक्त भी नहीं दिया। मेरे होठों से एक दबा हुआ सा अहसास निकल गया और मेरा सिर पीछे घूमकर विक्रम के कंधे पर टिक गया। उस पल में मेरे होश-ओ-हवास की आखिरी दीवार भी ढह गई। मैं पूरी तरह से उस अहसास और आकर्षण के समंदर में डूब गई।
जब सुबह की पहली सुनहरी किरण कांच की खिड़की को चीरकर अंदर आई, तो पूरा कमरा शांत हो चुका था।
मैं कारपेट वाले फर्श पर लेटी हुई थी, पसीने की हल्की बूंदों से चमकती हुई, और मेरा सिर विक्रम की चौड़ी, नंगी छाती पर टिका था। मेरी सांसें अभी भी धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं और पूरे शरीर में एक मीठा सा दर्द महसूस हो रहा था। विक्रम की उंगलियां आराम से मेरी नंगी पीठ पर सहला रही थीं।
मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं और विक्रम की धड़कनों को सुनती रही। मुझे लगा जैसे मैं समर्पण और प्यार के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंच चुकी हूं—एक ऐसा अहसास जो मैंने अपनी जिंदगी में कभी महसूस नहीं किया था। लेकिन, मैं इस खौफनाक सच से पूरी तरह अनजान थी कि बेइंतहा जुनून से भरी वो रात कोई प्यार नहीं, बल्कि रेहान का मुझे वापस पाने का एक खौफनाक और उलझा हुआ खेल था।
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